वैशाख अमावस्या पर शाम को दीपदान करने से नहीं रहता अकाल मृत्यु का डर

हिंदू कैलेंडर के अनुसार 22 अप्रैल को वैशाख माह अमावस्या है। इस दिन प्रदोष काल में यानी शाम को दीपदान करने से अकाल मृत्यु नहीं होती है। पौराणिक कथा के अनुसार इस पर्व पर पिंडदान, श्राद्ध या तर्पणकरने से पितरोंको तृप्ति मिलती है। दक्षिण भारत में दक्षिण भारत में वैशाख अमावस्या पर शनि जयंती भी मनाई जाती है। इसलिए इस दिन शनिदेव की पूजा और आराधना करने का भी महत्व है। इसके साथ ही वैशाख माह की अमावस्या पर क्या करें और क्या न करें,इन बातों का ध्यान भी रखना चाहिए।


वैशाख अमावस्या के दिन ये करें

  1. वैशाख अमावस्या के दिन व्रत करना चाहिए। इससे संयम, आत्मबल और आत्मविश्वास प्राप्त होता है।
  2. इस अमावस्या के दिन स्नान के जल में तिल डालकर स्नान करने से शनि के दोषों से मुक्ति मिलती है।
  3. इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण करना चाहिए। इससे उन्हें मुक्ति मिलती है।
  4. पितृ दोष निवारण के लिए वैशाख अमावस्या के दिन पितरों के नाम से गरीबों को भोजन करवाएं।
  5. इस दिन स्नान करके सूर्य को जल में तिल डालकर अर्घ्य देने से ग्रह दोष दूर होते हैं।
  6. वैशाख अमावस्या पर पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने से रोग मुक्ति होती है।

अमावस्या पर ये करने से बचें

  1. इस दिन मांसाहार और किसी भी तरह का नशा नहीं करना चाहिए।
  2. भोग और विलासिता से बचने की कोशिश करनी चाहिए।
  3. उड़दया इससे बनी कोई भी चीज न खाएं।
  4. मांगलिक कार्य, शुभ कामों के लिए खरीदारी और नए काम की शुरुआत नहीं करनी चाहिए।

वैशाख अमावस्या:पौराणिक कथा

  • वैशाख अमावस्या के महत्व से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार धर्मवर्ण नाम के एक ब्राह्मण थे। एक बार उन्होंने किसी महात्मा के मुख से सुना कि कलियुग में भगवान विष्णु के नाम स्मरण से ज्यादा पुण्य किसी भी काम में नहीं है।
  • इसके बादधर्मवर्ण ने सांसारिक जीवन छोड़ दिया और संन्यास लेकर भ्रमण करने लगे। एक दिन घूमते हुए वे पितृलोक पहुंचें। वहां उनके पितर बहुत कष्ट में थे। पितरों ने बताया कि ऐसी हालत तुम्हारे संन्यास के कारण हुई है। क्योंकि उनके लिए पिंडदान करने वाला कोई नहीं है।
  • पितरों ने कहा अगर तुम वापस जाकर गृहस्थ जीवन की शुरुआत करो, संतान उत्पन्न करो और साथ ही वैशाख अमावस्या के दिन विधि-विधान से पिंडदान करो। तो हमें राहत मिल सकती है।
  • धर्मवर्ण ने उन्हें वचन दिया कि वह उनकी ये इच्छा पूरी करेंगे। इसके बाद उन्होंने संन्यासी जीवन छोड़कर फिर से सांसारिक जीवन अपनाया और वैशाख अमावस्या पर विधि विधान से पिंडदान कर अपने पितरों को मुक्ति दिलाई।


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Fear of premature death is not avoided by donating lamp in the evening on Vaishakh Amavasya


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