कुंडली में कुलनाशक विषकन्या योग : जानें कैसे जिंदगी करता है प्रभावित

ज्योतिषशास्त्र में जिस तरह से तिथि, वार, ग्रह, नक्षत्र आदि के संयोगों से कई प्रकार के योगों निर्मित होते हैं। उसी प्रकार इन्हीं की गड़बड़ी के चलते कई कुयोगों का भी निर्माण होता है।

प्रमुख योगों में जहां हम गजकेसरी योग, राजयोग, हंस योग, भद्रयोग, मालवीय योग, बुधादित्य योग आदि जैसे कई छोटे-बड़े शुभ फलदायक योग शामिल है। ठीक इसी तरह कुंडली में वैधव्य, नाशक, पितृदोष, ज्वालामुखी, विषकन्या योग, मांगलिक योग, कालसर्प योग व विष योग जैसे अति अशुभ और बेहद कष्टदायक योग भी बनते हैं।

अशुभ योगों में सर्वोपरि है विषकन्या योग...
ज्योतिष के जानकार सुनील शर्मा की मानें तो जहां एक ओर शुभ योगों में राजयोग और गजकेसरी योग सबसे सर्वोपरि माने जाते हैं, तो वहीं अशुभ योगों में विषकन्या योग सबसे प्रमुख माना जाता है।

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नाम के ही अनुरूप होने वाले ये शुभ योग जहां जातक को राजसी सुख और गुणों से युक्त,जीवन दीर्घजीवी, कुशाग्रबुद्धि,शत्रुहन्ता, वाकपटु, तेजस्वी एवं यशस्वी बनते हैं। वहीं कुंडली में मौजूद ‘विषकन्या’ योग जातक के वैवाहिक जीवन में अशांति उत्पन्न करने का कार्य करता है।

विवाहित सुख से वंचित...
विषकन्या को एक ऐसा योग माना जाता है जो दाम्पत्य जीवन में हानि पहुंचाता है,वहीं इससे बचने के लिए विवाह से पहले वर-वधु की कुंडली को किसी विद्वान ज्योतिषी से दिखाते हुए ज़रूरी उपाय किए जाते हैं, अन्यथा विषकन्या योग जातक को पति-पुत्रहीन, सम्पत्ति हीन, सुख की न्यूनता आदि जैसे अशुभ फल देता है।

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इन परिस्थितियों से होता है स्त्री की कुंडली में विषकन्या योग का निर्माण:-

नक्षत्र : वार : तिथि
अश्लेषा तथा शतभिषा : रविवार : द्वितीया
कृतिका अथवा विशाख़ा अथवा शतभिषा : रविवार : द्वादशी
अश्लेषा अथवा विशाखा अथवा शतभिषा : मंगलवार : सप्तमी
अश्लेषा : शनिवार : द्वितीया
शतभिषा : मंगलवार : द्वादशी
कृतिका : शनिवार : सप्तमी या द्वादशी

ये स्थितियां भी करती हैं विषकन्या योग का निर्माण:-

: कुंडली में शनि लग्न में, सूर्य पंचम भाव में व मंगल नवम भाव में होने पर ‘विषकन्या’ योग का निर्माण होता है।

: कुंडली के लग्न व प्रथम भाव में कोई पाप ग्रह व अन्य शुभ ग्रह कुंडली के शत्रु क्षेत्री या षष्ठ, अष्टम व द्वादश स्थानों में बैठे हो तो भी ‘विषकन्या’ योग बनता है।

: साथ ही किसी स्त्री की कुंडली में छठे स्थान पर कोई पाप ग्रह किसी अन्य दो शुभ ग्रहों के साथ युति बनाए तो यह ‘विषकन्या’ योग बनाता है।

: इसके अलावा यदि किसी भी स्त्री की जन्म कुंडली के सप्तम स्थान में कोई भी पापी व क्रूर ग्रह बैठा हो और उनपर कोई अन्य क्रूर अथवा पापी ग्रह दृष्टि डाल रहा हो तो इससे कुंडली में विषकन्या योग का निर्माण होता है।

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विषकन्या योग का नकारात्मक प्रभाव
विषकन्या योग के संबंध में माना जाता है कि इस योग से पीड़ित जातक को अपने जीवन में तो अशुभ फलों की प्राप्ति होती ही है। साथ ही उनके संपर्क में आने वाले लोगों का जीवन भी इस योग के प्रभाव से हमेशा अस्त-व्यस्त हो जाता है, जिसके चलते उनके जीवन में भी दुर्भाग्य छा जाता है। विषकन्या स्त्रियां अपने माता-पिता, भाई-बहन के साथ-साथ अपने ससुराल वालों के लिए भी कष्टकारी सिद्ध होती है।

इन स्थितियों में विषकन्या योग हो जाता है शून्य-
: यदि किसी की कुंडली में विषकन्या योग तो बन रहा है, परंतु जन्म लग्न या चन्द्र लग्न से सप्तम भाव में सप्तमेश या शुभ ग्रह बैठा हो तो कुंडली में ‘विषकन्या’ योग से बनने वाला हर प्रकार का दोष शून्य हो जाता है।

: इसके साथ ही कुंडली में सप्तमेश शुभ स्थिति में हो और सप्तम भाव गुरु से दृष्टि कर रहा हो तो ऐसी स्थिति में भी ‘विषकन्या दोष’ दूर होता है।

: हालांकि इन स्थितियों के बावजूद भी स्त्री की कुंडली में विषकन्या योग की शांति कराना बेहद आवश्यक होता है।

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विषकन्या योग होने पर ज़रूर करें ये कार्य:-
: जिस भी स्त्री की कुंडली में विषकन्या योग का निर्माण होता है उसे सर्वप्रथम हर वटसावित्री व्रत रखना चाहिए।

: विषकन्या योग से पीड़ित कन्या के विवाह से पूर्व कुम्भ, श्री विष्णु या फिर पीपल अथवा शमी अथवा बेर के वृक्ष के साथ उसका विवाह कराना चाहिए।

: स्त्री को विषकन्या योग से निजात पाने हेतु सर्वकल्याणकारी “विष्णुसहस्त्रनाम” का पाठ आजीवन करने की सलाह दी जाती है।

: गुरु बृहस्पति की निष्ठा पूर्वक आराधना भी विषकन्या योग के अशुभ फलों को शून्य करती है।



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