आज राम नवमी, श्रीराम-सीता की सीख ध्यान रखेंगे तो बच सकते हैं परेशानियों से

जीवन मंत्र डेस्क. गुरुवार, 2 अप्रैल को राम नवमी है। त्रेतायुग में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर श्रीहरि ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। रामायण में श्रीराम से जुड़े कई ऐसे प्रेरक प्रसंग बताए गए हैं, जिनकी सीख ध्यान रखने पर हम कई परेशानियों से बच सकते हैं। यहां जानिए श्रीराम से जुड़े 3 प्रेरक प्रसंग...

पहला प्रसंग- पति-पत्नी के बीच नहीं होना चाहिए अहंकार

रामायण में जब सीता का स्वयंवर चल रहा था। शिवजी का धनुष तोड़ने वाले से सीता का विवाह किया जाना था। ये शर्त सीता के पिता राजा जनक ने रखी थी। कई राजाओं और वीरों ने प्रयास किया, लेकिन किसी से भी धनुष हिला तक नहीं। तब ऋषि विश्वामित्र ने राम को आज्ञा दी और कहा जाओ राम धनुष उठाओ। श्रीराम ने सबसे पहले अपने गुरु को नमन किया। फिर शिवजी का ध्यान करके धनुष को प्रणाम किया। धनुष को उठाया और उसे किसी खिलौने की तरह तोड़ दिया।

इस प्रसंग में एक सीख छिपी है। दार्शनिक रूप से समझें तो धनुष अहंकार का प्रतीक है। अहंकार जब तक हमारे भीतर होगा, हम किसी के साथ अपना जीवन नहीं बीता सकते। अहंकार को तोड़कर ही वैवाहिक जीवन में में प्रवेश करना चाहिए। पति-पत्नी के बीच अहंकार होना ही नहीं चाहिए, तभी जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

दूसरा प्रसंग- पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति समर्पण

श्रीराम को वनवास जाना था और वे चाहते थे सीता वनवास न चले और मां कौशल्या के पास ही अयोध्या में रुके। कौशल्याजी भी चाहती थीं कि सीता न जाए। जबकि सीताजी श्रीराम के साथ वनवास जाना चाहती थीं।

श्रीराम ने सीता को समझाया कि वन में कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ेगा। वहां भयंकर राक्षस होंगे, सांप होंगे, वन की धूप, ठंड और बारिश भयानक होती है, तरह-तरह की परेशानियां आएंगी। इन सभी परेशानियों का सामना करना किसी राजकुमारी के लिए संभव नहीं है।

श्रीराम ने बहुत समझाया, लेकिन सीता ने वनवास जाने के लिए श्रीराम और माता कौशल्या को मना लिया। सीता ने श्रीराम के प्रति समर्पण का भाव दर्शाया और अपने स्वामी के साथ वे भी वनवास गईं। समर्पण की इसी भावना की वजह से श्रीराम और सीता का वैवाहिक जीवन दिव्य माना जाता है। समर्पण के भाव से ही पति-पत्नी के बीच प्रेम बना रहता है।

तीसरा प्रसंग- पति-पत्नी को समझनी चाहिए एक-दूसरे के मन की बात

वनवास जाते समय श्रीराम, लक्ष्मण, सीता को गंगा नदी पार करना थी। उस समय एक केवट ने अपनी नाव से इन्हें गंगा नदीं पार करवाई थी। तब श्रीराम के पास उस केवट को देने के लिए कुछ नहीं था। ऐसी स्थिति में सीता ने श्रीराम के चेहरे पर संकोच के भाव देखे तो सीता ने तुरंत ही अपनी अंगूठी उतारकर उस केवट को भेंट स्वरूप देनी चाही, लेकिन केवट ने अंगूठी नहीं ली। केवट ने कहा कि वनवास पूरा करने के बाद लौटते समय आप मुझे जो भी देंगे मैं उसे प्रसाद स्वरूप स्वीकार कर लूंगा।

इस प्रसंग की सीख यह है कि पति-पत्नी की हर स्थिति में एक-दूसरे के मन की बात समझनी चाहिए।



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
ramayana, ramcharit manas, ram navami 2020, motivational story for wife and husband, family management tips


Comments