अक्षय तृतीया पर करें भगवान विष्णु की पूजा करने की परंपरा, शंख से करें विष्णु-लक्ष्मी का अभिषेक

रविवार, 26 अप्रैल को वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि है। इस तिथि को अक्षय तृतीया और आखा तीज कहा जाता है। इस तिथि का विशेष महत्व है, क्योंकि ये तिथि सालभर में आने वाले 4 अबूझ मुहूर्तों में से एक है। अक्षय तृतीया के अलावा देवउठनी एकादशी, वसंत पंचमी और भड़ली नवमी को भी अबूझ मुहूर्त माना जाता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार अक्षय तृतीया पर किए गए दान करने का अक्षय यानी कभी नाश न होने वाला फल और पुण्य मिलता है। इसे चिरंजीवी तिथि भी कहते हैं, क्योंकि इसी तिथि पर अष्टचिरंजीवियों में एक भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। भगवान विष्णु के नर-नरायण, हयग्रीव अवतार भी इसी तिथि पर हुए हैं। इसी वजह से अक्षय तृतीया पर भगवान विष्णु की विशेष पूजा करनी चाहिए।

ऐसे कर सकते हैं विष्णुजी की पूजा

गाय के कच्चे दूध दूध में केसर मिलाकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें। भगवान विष्णु को खीर, पीले फल या पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं। विष्णुजी के साथ ही माता लक्ष्मी की भी पूजा करें।

दक्षिणावर्ती शंख में गंगाजल भरकर उससे भगवान विष्णुजी और देवी लक्ष्मी का अभिषेक करें। पीपल में भगवान विष्णु का वास माना गया है। इसलिए इस दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं।

विष्णु भगवान के मंदिर में अन्न का दान करें या जरूरतमंद लोगों को वितरीत करें। इस दिन सूर्यास्त के बाद शालिग्राम के साथ ही तुलसी के पौधे के सामने गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं।

विष्णुजी को पीतांबरधारी कहते हैं, इसलिए उन्हें पीले वस्त्र अर्पित करना चाहिए। विष्णुजी को तुलसी की माला अर्पित करें। कमल का फूल या अन्य कोई पीले रंग के फूल चढ़ाना शुभ रहता है। अक्षय तृतीया पर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को इत्र अर्पित करें।



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