अर्जुन शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर रहे थे, तभी वहां एक जंगली सूअर आ गया

महाभारत में जब कौरव और पांडवों के बीच युद्ध तय हो गया तो अर्जुन देवराज इंद्र से दिव्यास्त्र पाना चाहते थे। इसलिए अर्जुन इंद्र से मिलने इंद्रकील पर्वत पर पहुंच गए। इंद्रकील पर्वत पर इंद्र प्रकट हुए और उन्होंने से अर्जुन से कहा कि मुझसे दिव्यास्त्र प्राप्त करने से पहले तुम्हें शिवजी को प्रसन्न करना होगा। इसके बाद इंद्र की बात मानकर अर्जुन ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या प्रारंभ कर दी।

अर्जुन जहां तपस्या कर रहे थे, वहां मूक नामक एक असुर जंगली सूअर का रूप धारण करके पहुंच गया। वह अर्जुन को मारना चाहता था। ये बात अर्जुन समझ गए और उन्होंने अपने धनुष पर बाण चढ़ा लिया और जैसे ही वे बाण छोड़ने वाले थे, उसी समय शिवजी एक वनवासी के वेश में वहां आ गए और अर्जुन को बाण चलाने से रोक दिया।

वनवासी ने अर्जुन से कहा कि इस सूअर पर मेरा अधिकार है, ये मेरा शिकार है, क्योंकि तुमसे पहले मैंने इसे अपना लक्ष्य बनाया था। इसलिए इसे तुम नहीं मार सकते, लेकिन अर्जुन ने ये बात नहीं मानी और धनुष से बाण छोड़ दिया। वनवासी ने भी तुरंत ही एक बाण सूअर की ओर छोड़ दिया। अर्जुन और वनवासी के बाण एक साथ उस सूअर को लगे और वह मर गया। इसके बाद अर्जुन उस वनवासी के पास गए और कहा कि ये सूअर मेरा लक्ष्य था, इस पर आपने बाण क्यों मारा?

इस तरह वनवासी और अर्जुन दोनों ही उस सूअर पर अपना-अपना अधिकार जताने लगे। अर्जुन ये बात नहीं जानते थे कि उस वनवासी के भेष में स्वयं शिवजी हैं। वाद-विवाद बढ़ गया और दोनों एक-दूसरे से युद्ध करने के लिए तैयार हो गए।

अर्जुन ने अपने धनुष से वनवासी पर बाणों की वर्षा कर दी, लेकिन एक भी बाण वनवासी को नुकसान नहीं पहुंचा सका। जब बहुत प्रयास करने के बाद भी अर्जुन वनवासी को जीत नहीं पाए, तब वे समझ गए कि ये वनवासी कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। जब वनवासी ने भी प्रहार किए तो अर्जुन उन प्रहारों को सहन नहीं कर पाए और अचेत हो गए। कुछ देर बाद अर्जुन को होश आया तो उन्होंने मिट्टी का एक शिवलिंग बनाया और उस एक माला चढ़ाई। अर्जुन ने देखा कि जो माला शिवलिंग पर चढ़ाई थी, वह उस वनवासी के गले में दिखाई दे रही है। ये देखकर अर्जुन समझ गए कि शिवजी ने ही वनवासी का वेश धारण किया है। ये जानने के बाद अर्जुन ने शिवजी की आराधना की। शिवजी भी अर्जुन के पराक्रम से प्रसन्न हुए और पाशुपतास्त्र दिया। शिवजी की प्रसन्नता के बाद अर्जुन देवराज के इंद्र के पास गए और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त किए।



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