28 दिन तक रोजे शरीर और दिमाग को बनाते है मजबूत, रमजान महीने में ही कुरान उतरने की शुरुआत, 23 साल में पूरी हुई थी कुरान-ए-पाक

प्रो. आफताब आलम. इस्लाम के पांच मूल स्तंभों में से एक प्रमुख स्तंभ रमजान के महीने में रखा जाने वाला सौम या रोज़ा (उपवास) है। इस्लाम के अलावा अन्य धर्मों में भी उपवास का उल्लेख मिलता है। रमज़ान इस्लामी महीनों में नौवां है, इस महीने में रोज़े रखना हर सेहतमंद मुसलमान पर फ़र्ज़ है। रोज़े के दौरान सुबह सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ भी खाने या पीने पर पाबंदी होती है। इसकी वज़ह से रोजेदार सुबह सहरी के वक्त खाना खाते हैं और फिर पूरे दिन कुछ भी नहीं खाते पीते और फिर शाम को इफ्तार के बाद रोजा खोलते हैं।

इस्लामिक मान्यता के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि इस महीने रोजा रखने वाले रोजेदारों को कई गुना सवाब मिलता है और उन्हें जन्नत नसीब होती है। धार्मिक मान्यता के अतिरिक्त रोज़े को वैज्ञानिक कारणों से भी महत्वपूर्ण माना जाता है, शोधों से पता चलता है कि रोज़े से न सिर्फ मानसिक तनाव को कम किया जा सकता है बल्कि इससे शरीर से अनेक विकारों को दूर करने में भी मदद मिलती है। जापान के नोबेल चिकित्सा पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक योशिनोरी ओहसुमी का मत है कि रमजान माह के दौरान रोजा रखने से शरीर के कैंसर से लड़ा जा सकता है। उनका मानना है कि साल में लगभग 25 से 28 दिनों तक 8 घंटे से 14 घंटे भूखा रहने से कैंसर के वायरस को शरीर से खत्म किया जा सकता है।

आमतौर पर खजूर खाकर ही रोजे खोले जाते हैं, हालांकि, किसी के पास खजूर उपलब्ध नहीं है तो वह पानी पीकर भी रोजे खोल सकता है। खजूर में ग्लूकोज, सुक्रोज और फ्रुक्टोज पाए जाते हैं, जिससे शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है। खजूर का सेवन करने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी कम होता है, जिससे दिल की बीमारियां होने का खतरा नहीं रहता। खजूर का सेवन नर्वस सिस्टम के लिए भी फायदेमंद होता है। खजूर में आयरन पाया जाता है, जो कि खून से संबंधित बीमारियों से निजात दिलाता है।

कहा जाता है कि रमजान के महीने में रोजा रखने का अर्थ केवल रोजेदार को उपवास रखकर, भूखे-प्यासे रहना नहीं है। बल्कि इसका सच्चा अर्थ है अपने ईमान को बनाए रखना। मन में आ रहे बुरे विचारों का त्याग करना। रोजे का अर्थ है अपने गुनाहों से तौबा करना। रोजे का सामाजिक महत्व भी है। इसमें भूख और प्यास की अहमियत का पता चलता है और लोगों को ग़रीबों की मदद करने के प्रेरणा मिलती है।

ऐसी मान्यता है कि रमजान के महीने में ही मुसलमानों की पाक किताब क़ुरान करीम आसमान से दुनिया पर तमाम इंसानों की रहनुमाई के लिए उतरनी शुरू हुई और इसके बाद थोड़ा थोड़ा करके ज़रूरत के मुताबिक तकरीबन 23 साल में मुकम्मल हुई। कुरान की आयत संख्या 185 में कहा गया है कि ‘रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुरान करीम नाज़िल हुआ”। मुसलमानों पर रोज़े के फ़र्ज़ होने का उल्लेख भी कुरान में मिलता है जिसमें कहा गया है कि “ऐ ईमान वालों तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए हैं जिस तरह तुमसे पहले लोगों पर फ़र्ज़ किए गए थे ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ” (सूरह अलबकरा 183).

रमजान के तीस रोज़े रखने के बाद ईद का त्योहार मनाया जाता है। इसे ईद-उल-फितर या मीठी ईद भी कहा जाता है क्‍योंकि रोजे खत्‍म होने के बाद सबसे पहले मीठी चीज जैसे शीर, सेवइयां आदि खाने का रिवाज है। ईद रोज़ादारों के लिये एक इनाम के समान होती हैं, जिन्होंने महीना भर रोजे रखकर अल्लाह की इबादत की। ईद के द्वारा मुसलमान अपने मालिक खुदा का शुक्र भी अदा करता है की उसने हमें अपने हुक्म के अनुसार इस पाक महीने में रोज़ा रखने और अपने इबादत करने तथा अच्छे काम करने के दायित्व को पूरा करने का मौका दिया।

इस्लाम के मान्यताओं में एक साल में दो बार ईद का त्योहार मनाया जाता है, ईद-उल-अजहा और ईद-उल-फितर। पहली ईद जिसे ईद-उल-फितर या मीठी ईद कहते हैं। इसके 70 दिन बाद दूसरी ईद. जिसे ईद-उल-अजहा कहा जाता है, मनाई जाती है। इसे बकरीद भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन धार्मिक मर्यादाओं के अनुसार बकरे की कुर्बानी दी जाती है। बकरीद की शुरुआत इस्लाम के एक और पैगंबर हजरत इब्राहिम से हुई। ऐसी मान्यता है कि हजरत इब्राहिम को सपने में अल्लाह ने उससे सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी देने के लिए कहा तो उन्होंने अपने बेटे की ही बलि देने का फैसला किया। ऐसा करते हुए कहीं उनके हाथ रुक न जाएं, इसलिए उन्‍होंने अपने आंखों पर पट्टी बांध ली। बलि देने के बाद जब उन्‍होंने पट्टी खोली तो देखा कि उनका बेटा तो उनके सामने जिंदा खड़ा था और जिस की बलि दी गई थी वो बकरी, मेमना, भेड़ की तरह दिखने वाला जानवर था। इसी दिन से इसे त्‍योहार के रूप में मनाया जाने लगा और इसका नाम बकरीद पड़ गया।

(लेखक - अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर और मुस्लिम मामलों के टिप्पणीकार हैं।)



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