पांडवों से सीख सकते हैं, परिवार में समर्पण और प्रेम रहेगा तभी मिलेगी जीत

5 मई को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है। वेदों सहित हिंदू धर्म के कई ग्रंथों में बताया गया है कि एक आदर्श परिवार कैसा होना चाहिए। जिस तरह त्रेतायुग में राजा दशरथ का परिवार त्याग, प्रेम और एकता, सम्मान और समर्पण की प्रेरणा देता है, वहीं द्वापर युग यानी महाभारत काल में पांडवों से भी ये बातें सीख सकते हैं।

  • पांडवों के परिवार में मां कुंती के तीन पुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन और भीम थे। वहीं नकुल और सहदेव माद्री के बेटे थे। कुंती ने पांचों भाइयों में कभी भेद-भाव नहीं किया। सभी को बराबर प्रेम किया। पांडव अपनी मां कुंती की हर बात मानते थे। सभी भाइयों में आपस में प्रेम था और हर भाई को अपनी जिम्मेदारी का ज्ञान भी था। इन्हीं कारणों से पांडव जहां भी रहे, हमेशा सुखी रहे। पांडवों में एकता होने से ही उन्हें जीत मिली। इसलिए परिवार में एकता का होना जरूरी है। जिन परिवारों में एकता और ऐसा समर्पण भाव नहीं होता है वहां अक्सर झगड़े होते हैं। अशांति और बिखराव की स्थिति भी बन जाती है।

पांडवों से सीखने वाली बातें

समर्पण और प्रेम

पांडवों में एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव था। पांचो भाई हर काम समर्पण भाव से ही करते थे। अज्ञातवास के दौरान सभी ने हर काम को मिलकर और समर्पण भाव से किया। उनमें प्रेम नहीं होता तो अपने-अपने अधिकारों के लिए लड़ाई होती और आपस में फूट पड़ जाती।

धैर्य

धर्मराज युधिष्ठिर और अर्जुन शक्तिशाली होने के बाद भी धैर्य रखते थे। भरी सभा में अपमानित होने के बावजूद पांचो पांडवों ने धैर्य से सब कुछ सहन किया। नकुल-सहदेव अन्य भाइयों से छोटे थे। उन्होंने हर जगह धैर्य रखा और वही किया जो बड़े भाइयों और माता ने कहा।

सम्मान

पांडवों में आपस में एक-दूसरे के लिए सम्मान था। धर्मराज युधिष्ठिर सबसे बड़े होने के बावजूद अर्जुन, भीम और नकुल-सहदेव का सम्मान करते थे। हर बड़े कार्य में उनसे सलाह लेते थे। भीम सबसे बलशाली था और अर्जुन से अच्छा कोई धनुर्धर नहीं था। इसके बावजूद इन्होंने सभी भाइयों का सम्मान किया और कभी खुद पर अभिमान नहीं किया।

जिम्मेदारी

सभी भाइयों ने अपना-अपना काम जिम्मेदारी से किया। हर भाई को अपने कर्तव्य का ज्ञान था। किसे क्या करना है, सभी की जिम्मेदारी तय थी। इसी वजह से पांडव जहां भी रहे, सुखी रहे। सभी भाइयों ने अपनी-अपनी जिम्मेदारी के अलावा भी काम किया लेकिन उसको लेकर आपस में कभी विवाद नहीं किया।

एकता

कुंती सहित पांचों भाइयों में एकता होना ही परिवार का सबसे बड़ा गुण था। कुंती ने माद्री के पुत्र नकुल-सहदेव से कभी बैर भाव नहीं रखा। सभी बेटों को एक समान रखा और एकता की ही शिक्षा दी। इसलिए इनमें कभी आपस में लड़ाई नहीं हुई।



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