ब्रह्म पुराण में अमावस्या को कहा गया है पर्व, इस तिथि पर औषधियों में होता है चंद्रमा का वास

शुक्रवार, 22 मई को ज्येष्ठ महीने की अमावस्या है। इसे पितरों की तिथि माना जाता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार इसे पर्व कहा गया है। इस तरह धार्मिक नजरिये से अमावस्या पर स्नान, दान और पूजा-पाठ करने को धार्मिक कर्तव्य माना गया है। जिनको करने से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं और देवता प्रसन्न होते हैं। पुराणों में बताया गया है कि सनातन धर्म में विश्वास रखने वाले सभी लोगों को अमावस्या पर इन जरूरी बातों के साथ पितरों की पूजा खासतौर से करनी चाहिए। गरुड़ पुराण के अनुसार इस तिथि पर पितरों को संतुष्ट करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पीपल के पेड़ की पूजा करनी चाहिए।

ब्रह्म पुराण के अनुसार अमावस्या पर कर्म
अमावस्या तिथि पर चन्द्रमा का औषधियों में वास रहता है। इसलिए इस दिन पेड़-पौधों की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसा करने से शारीरिक बीमारियां और मानसिक परेशानियां दूर हो जाती हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार अमावस्या को सुबह पानी में कच्चा दूध और तिल मिलाकर पीपल में चढ़ाना चाहिए। पीपल के नीचे घी का दीपक लगाना चाहिए। फिर श्राद्ध और तर्पण करने चाहिए। इसके बाद दान करना चाहिए। शाम को घर के दरवाजे के बाहर दीपक लगाने चाहिए। इसके बाद कुए, तालाब या बोरवेल के पास दीपक जरूर लगाएं।

ज्योतिष में अमावस्या
ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार जब सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में या एक-दूसरे के पास वाली राशि में स्थित होते हैं तो अमावस्या का योग बनता है। ये कृष्णपक्ष की पंद्रहवीं तिथि है। भारत के कुछ हिस्सों में इसे हिंदू कैलेंडर के महीने का आखिरी दिन माना जाता है। इसके बाद से नया महीने की शुरुआत होती है। ज्येष्ठ महीने की अमावस्या पर चंद्रमाा अपनी उच्च राशि में होता है और सूर्य भी साथ में होता है। अमावास्या पर सूर्य और चन्द्रमा का अन्तर शून्य हो जाता है। इस तिथि पर खरीदारी और अन्य शुभ काम नहीं किए जाते हैं।

अमावस्या के साथ बनने वाले अन्य योग-संयोग
जब अमावस्या के दिन सोम, मंगल या गुरुवार के साथ अनुराधा, विशाखा और स्वाति नक्षत्र का योग बनता है, तो यह बहुत ही शुभ संयोग माना गया है। इसी तरह शनिवार और चतुर्दशी का योग भी विशेष फल देने वाला माना जाता है। इन तिथि वार और नक्षत्रों के संयोग में किए गए कामों में विशेषतौर से सफलता प्राप्त होती है।



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