पानी की अहमियत समझाने के लिए मनाते हैं निर्जला एकादशी और गंगा दशहरा पर्व

ज्येष्ठ महीना हिन्दू पंचांग का तीसरा महीना है। इस समय गर्मी का मौसम रहता है। इसलिए इस महीने में जल का महत्त्व बढ़ जाता है। इसलिए इन दिनों में खासतौर से जल की पूजा और दान किया जाता है। इस तरह जल को बचाने की कोशिश की जाती है। इसलिए ऋषि-मुनियों ने इस महीने में लगातार दो दिन पानी से जुड़े दो व्रत पर्व की व्यवस्था की है।

  • ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा पर्व मनाया जाता है। इसके अगले ही दिन एकादशी तिथि पर पूरे दिन बिना पानी पिए निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। इनके साथ ही पूरे महीने में जल दान किया जाता है।

गंगा दशहरा: ज्येष्ठ शुक्लपक्ष दशमी, 1 जून
इस व्रत से ऋषियों ने संदेश दिया है कि गंगा नदी की पूजा करनी चाहिए और जल की अहमियत समझनी चाहिए। कुछ ग्रंथों में गंगा नदी को ज्येष्ठ भी कहा गया है। क्योंकि ये अपने गुणों के कारण दूसरी नदियों से ज्यादा महत्वपूर्ण मानी गई हैं। इसलिए इसे ज्येष्ठ यानी दूसरी नदियों से बड़ा माना गया है। भौगोलिक नजरिये से देखा जाए तो सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदी गंगा से बड़ी हैं। लेकिन वैज्ञानिक रिसर्च के अनुसार गंगा के पानी गुणों से भरपूर है और इसका धार्मिक महत्व भी होने से गंगा दशहरा पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर गंगा नदी की पूजा के बाद अन्य 7 पवित्र नदियों की भी पूजा की जाती है।

निर्जला एकादशी: ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकादशी, 2 जून
गंगा दशहरे के अगले दिन ही निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। इस व्रत में पूरे दिन पानी नहीं पिया जाता है। कथा के अनुसार महाभारत काल में सबसे पहले भीम ने इस व्रत को किया था। इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा गया है। इस व्रत में सुबह जल्दी नहाकर भगवान विष्णु की पूजा में जल दान का संकल्प भी लिया जाता है। व्रत करने वाले पूरे दिन जल नहीं पीते और मिट्‌टी के घड़े में पानी भरकर उसका दान करते हैं। इस व्रत पर भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है। इस व्रत से पानी का महत्व पता चलता है।



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