हमें कर्म से भागना नहीं चाहिए और ना ही कर्म के फल की इच्छा करनी चाहिए, फल तो ईश्वर के हाथ में है

बुधवार, 12 अगस्त को जन्माष्टमी है। द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। उस समय कंस का आतंक था। श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया। इसके बाद पांडवों और कौरवों के बीच हुए युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन किया। श्रीकृष्ण के जीवन से हमें कर्म करते रहने की सीख लेना चाहिए।

महाभारत युद्ध से पहले अर्जुन ने अस्त्र-शस्त्र रख दिए थे। क्योंकि, अर्जुन भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य के विरुद्ध युद्ध लड़ना नहीं चाहते थे। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया और कर्म का महत्व समझाया था।

श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

आपका तो कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में नहीं। क्योंकि, फल तो ईश्वर के हाथ में है। इसलिए न कर्म से भागना उचित है और न ही कर्म के फल की आशा करना उचित है। महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण की कही ये बातें आज भी उतनी ही मत्वपूर्ण हैं, जितनी उस दौर में थीं।

इस श्लोक के अनुसार हमें भी किसी भी स्थिति में कर्म से भागना नहीं चाहिए। आजकल अधिकतर लोग कर्म करने से पहले ही उससे मिलने वाले फल के बारे में सोचते हैं। जब आशा के अनुरूप फल नहीं मिलते हैं तो निराशा होती है। इसीलिए कर्म करो, लेकिन फल की इच्छा मत करो। यही श्रीकृष्ण की सीख है।

कर्म का फल कैसा मिलेगा, ये भगवान पर छोड़ देना चाहिए। जो लोग धर्म के अनुसार काम करते हैं, भगवान का स्मरण करते हैं, उन्हें सफलता जरूर मिलती है।



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