कब होगी आपकी शादी? ग्रहों की नजर से ऐसे जानें

मेरी या मेरे पुत्र या पुत्री की शादी कब होगी, जीवनसाथी कैसा होगा, विवाह में कोई विलंब तो नहीं और अगर है तो क्या? और शादी के उपाय क्या हैं? ऐसे कई सवाल सामाजिक जीवन में लोगों के सामने आते ही रहते हैं। इस संबंध में ज्योतिष के जानकार पंडित सुनील शर्मा का कहना है कि कुंडली का सातवां घर बताता है कि आपकी शादी किस उम्र में होगी। शादी के लिए कौन सी दिशा उपयुक्त रहेगी जहां प्रयास करने पर जल्द ही शादी हो सके। वहीं जब एक से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव सातवें घर पर हो तो विवाह में विलंब होता है

सामान्यत: विवाह की अवस्था (18 से 28 के लगभग) में जब शनि और बृहस्पति दोनों सप्तम भाव और लग्न को देखते हों या गोचरवश इन भावों में आ जाएं तो उस अवधि में अवश्य विवाह होता है। लेकिन वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब कुंडली में सप्तमेश की दशा या अन्तर्दशा, सातवें घर में स्थित ग्रहों की दशा या अन्तर्दशा अथवा सातवें घर को देखने वाले ग्रहों दशा अन्तर्दशा हो, यदि छठे घर से संबंधित दशा या अन्तर्दशा चल रही हो तो विवाह में विलंब या विघ्न उत्पन्न होता है। वहीं कई बार विलंब से शादी होने पर भी उपयुक्त जीवन साथी नहीं मिल पाता है।

जल्द विवाह के उपाय
– भगवान शिव के साथ माता पार्वती की भी पूजा करें। माता पार्वती की पूजा खासतौर पर लड़कियों को करनी चाहिए। पूजा में मां पार्वती को सुहाग का सामान चढ़ाएं, बाधाएं दूर होंगी।

– प्रतिदिन विघ्नहर्ता गणेश और रिद्धि-सिद्धि की पूजा करें।

– भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा खास तौर पर गुरुवार को एक साथ करें।

– विवाह में बाधाएं उत्पन्न करने वाले ग्रह गुरु, शनि और मंगल के उपाय करें।

पंडित शर्मा के अनुसार व्यक्ति की सारी गतिविधियां ग्रह, नक्षत्र और राशियों से प्रभावित होती हैं। किसी भी कार्य को होने में उस कार्य से संबंधित ग्रह का क्रियान्वित होना जरूरी होता है। तभी जाकर कार्य संपन्न होता है।
- विवाह समय निर्धारण के लिये सबसे पहले कुण्डली में विवाह के योग देखे जाते हैं। यदि जन्म कुंडली में विवाह के योग नहीं होंगे तो शादी होना असंभव है।
- जन्म कुण्डली में जब अशुभ या पापी ग्रह सप्तम भाव, सप्तमेष व शुक्र से संबंध बनाते हैं, तो वे ग्रह विवाह में विलम्ब का कारण बनते हैं। इसके विपरीत यदि शुभ ग्रहों का प्रभाव सप्तम भाव, सप्तमेष व शुक्र पर पड़ता हो तो शादी जल्द होती है।


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- शादी होने में दशा का योगदान काफी महत्वपूर्ण होता है। सप्तमेष की दशा-अन्तर्दशा में विवाह- यदि जन्म कुण्डली में विवाह के योग की संभावनाएं बनती हों, और सप्तमेश की दशा चल रही हो और उसका संबंध शुक्र ग्रह से स्थापित हो जाय तो जातक का विवाह होता है। इसके साथ ही यदि सप्तमेश का द्वितीयेश के साथ संबंध बन रहा हो तो उस स्थिति में भी विवाह होता है।

सप्तमेश में नवमेश की दशा- अन्तर्दशा में विवाह: जब शा का क्रम सप्तमेश व नवमेष का चल रहा हो और इन दोनों ग्रहों का संबंध पंचमेष से बनता हो तो इस ग्रह दषा में प्रेम विवाह होने की संभावनाएं बनती हैं। पंचम भाव प्रेम संबंध को दर्शाता है। सप्तम भाव में स्थित ग्रहों की दषा में विवाह सप्तम भाव में जो ग्रह स्थित होते हैं वे ग्रह भी जातक की शादी कराते हैं बशर्ते कि उन ग्रहों की दशा अंतर्दशा चल रही हो और वे सप्तमेश से पूर्ण दृष्टि संबन्ध बना रहे हों और वे कुंडली में मजबूत स्थिति में हों।

- सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश जब शुभ भाव में, अपने मित्र राशि के घर में बैठे हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो वे अपनी दशा के प्रारंभिक अवस्था में ही जातक की शादी करा देते हैं। इसके विपरित यदि सप्तमेश और सप्तम भाव में स्थित ग्रह अशुभ भाव में बैठे हों, अपनी शत्रु राशि में हों और उन पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो वे अपनी दशा के मध्य में जातक की शादी कराते हैं।

इसके अलावा कुंडली में ग्रहों की स्थिति, दृष्टि, युति से बनने वाले योग भी जातक के विवाह होने की संभावनाएं बनाते हैं: -शादी में शुक्र का महत्वपूर्ण स्थान है। जब शुक्र शुभ स्थित होकर किसी व्यक्ति की कुण्डली में शुभ ग्रह की राषि तथा शुभ भाव (केन्द्र, त्रिकोण) में स्थित हो, और शुक्र की अन्तर्दषा या प्रत्यन्तर दषा जब आती है तो उस समय विवाह हो सकता है। कुण्डली में शुक्र का शुभ होना वैवाहिक जीवन की शुभता को बढ़ाता है। कुंडली में शुक्र जितना ही शुभ होगा व्यक्ति का वैवाहिक जीवन सुखमय होगा।

- कुंडली में चाहे किसी भी ग्रह की दशा क्यों न हो। यदि दषानाथ का संबंध शुक्र से बनता हो और कुंडली में शुक्र शुभ राषि, शुभ ग्रह से युक्त होकर नैसर्गिक रुप से शुभ हों, और गोचर में शनि, गुरु से संबन्ध बनाता हो, उस स्थिति में शुक्र अपनी दषा-अन्तर्दषा में विवाह होने का संकेत करता है।

- कुंडली में ऐसे ग्रह की दशा चल रही है जो ग्रह सप्तमेश का मित्र है तो इस महादषा में व्यक्ति के विवाह होने के योग बनते हैं बशर्ते कि उसका संबंध सप्तमेष या शुक्र से बनता हो।

- जन्म कुण्डली में शुक्र जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित होता है उस ग्रह की जब दषा चलती है तो उस समय में भी विवाह होने की संभावनाएं बनती हैं।

- सप्तम भाव शादी का घर होता है। इस भाव को जो ग्रह देख रहा हो और वह कुंडली में बली हो तो उस ग्रह की दशा अवधि में विवाह की संभावना बनती है।

- यदि कुंडली में लग्नेष व सप्तमेष की दषा चल रही हो तो ऐसी स्थिति में लग्नेष की दषा में सप्तमेष की अन्तर्दषा में विवाह होने की संभावनाएं बनती हैं ।

- शुक्र से युति करने वाले ग्रहों की दषा में विवाह होने की संभावना बनती है बशर्ते कि वह बली हो और सप्तमेश से दृष्टि संबंध बना रहा हो। अतः उन सभी ग्रहों की दषा-अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाएं बनती हैं।

शादी के कारक...
– सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों यथा गुरु शुक्र आदि की दृष्टि हो।

– सप्तमेश लग्न में या लग्नेश सप्तम में हो।

– सप्तम भाव का स्वामी केंद्र अथवा त्रिकोण में स्थित हो।

– सप्तमेश ग्यारहवें भाव (लाभ भाव) में हो।

– सप्तम भाव के कारक ग्रह शुक्र पर अशुभ की दृष्टि या युति न हो तथा शुक्र ग्रह केंद्र या त्रिकोण भाव में स्थित हो।

– सप्तमेश उच्च होकर लग्नेश से युति बना रहा हो।

– नवमेश सप्तमेश हो और सप्तमेश नवम भाव में हो तो शादी होती है।

कुंडली में सातवें भाव का महत्व
ज्योतिष विद्या के महान विद्वान सत्याचार्य के अनुसार, जन्म कुंडली में सातवां भाव गृह परिवर्तन एवं विदेश यात्राओं के विषय में बताता है। वहीं ऋषि पराशर के अनुसार, यदि प्रथम भाव का स्वामी सातवें भाव में स्थित होता है तो व्यक्ति अपने मूल स्थान से दूर धन संपत्ति को बनाता है। सप्तम भाव क़ानूनी रूप से दो लोगों के बीच साझेदारी को भी दर्शाता है। यह साझेदारी वैवाहिक अथवा व्यापारिक हो सकती है। काल पुरुष कुंडली में तुला राशि को सातवें भाव का स्वामित्व प्राप्त है।

वहीं लाल किताब के अनुसार, कुंडली में सप्तम भाव परिवार, नर्स, जन्मस्थान, आंगन आदि को बताता है। लाल किताब का सिद्धांत कहता है कि सप्तम भाव में बैठे ग्रह प्रथम भाव में स्थित ग्रहों के द्वारा संचालित होते हैं। इसको सरल भाषा में समझें तो, प्रथम भाव में ग्रहों की अनुपस्थिति होने पर सातवें घर में जो ग्रह होंगे वे निष्क्रिय और प्रभावहीन होंगे। सप्तम भाव में केवल मंगल और शुक्र का प्रभाव देखने को मिलेगा। लाल किताब के अनुसार, जन्म कुंडली में स्थित सातवां भाव जीवनसाथी के बारे में भी बताता है।



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