विष्णुजी के दस अवतारों की सीख मन शांत रखें और अधर्म से दूर रहें, अधिकमास में श्रीहरि की पूजा और कथा सुनने की सुनने की परंपरा

आज 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक अधिकमास रहेगा। इसे पुरुषोत्तम मास और मलमास भी कहते हैं। भगवान विष्णु ने इस माह को अपना श्रेष्ठ नाम पुरुषोत्तम दिया है। इसी वजह से अधिकमास में विष्णुजी की पूजा करने और उनके दस अवतारों की कथा सुनने की परंपरा है। विष्णुजी के अवतारों की सीख यह है कि बुराई का अंत जरूर होता है। हमें हर स्थिति में मन शांत रखना चाहिए और अधर्म से बचना चाहिए। हमेशा सकारात्मक रहें। तभी जीवन में सुख-शांति मिल सकती है।

हर बार अधिकमास में जगह-जगह भागवत कथाओं का आयोजन होता है, लेकिन इस साल कोरोना महामारी की वजह से इस तरह के धार्मिक आयोजन नहीं हो पाएंगे। ऐसी स्थिति में अपने घर पर ही ग्रंथों को पढ़ सकते हैं, टीवी पर, सोशल मीडिया पर संतों की कथाएं सुन सकते हैं। अधिकमास में ध्यान करने की भी परंपरा है।

यहां जानिए भगवान विष्णुजी के दस अवतारों से जुड़ी खास बातें...

1. मत्स्य अवतार

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया पर भगवान विष्णु के पहले अवतार मत्स्य की जयंती मनाई जाती है। मत्स्य पुराण के अनुसार विष्णुजी ने पुष्पभद्रा नदी किनारे मत्स्य अवतार लिया था। प्राचीन समय में असुर हयग्रीव का आतंक बढ़ गया था और पूरी पृथ्वी जल मग्न हो गई थी। तब मछली के रूप में श्रीहरि का पहला मत्स्य अवतार हुआ। मत्स्य स्वरूप में हयग्रीव का वध किया और जल प्रलय से पृथ्वी के सभी जीवों की रक्षा की थी।

2. कूर्म अवतार

हर साल वैशाख माह की पूर्णिमा पर कूर्म जयंती मनाई जाती है। ये भगवान विणु का दूसरा अवतार माना गया है। इस अवतार के संबंध में कथा प्रचलित है कि प्राचीन समय में जब समुद्र मंथन हुआ, तब विष्णुजी ने कछुए का रूप लेकर अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को ग्रहण किया था। देवताओं और दानवों ने वासुकि नाग को रस्सी की तरह मंदराचल की नेती बनाया और समुद्र को मथा था। इस मंथन में हलाहल विष निकला, जिसे शिवजी ने ग्रहण किया था। इसके बाद 14 रत्न निकले। अमृत कलश निकला।

3. वराह अवतार

भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर वराह जयंती मनाई जाती है। वराह यानी शुकर। इस अवतार का मुख शुकर का था, लेकिन शरीर इंसानों की तरह था। दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में छिपा दिया था। तब ब्रह्माजी की नाक से विष्णुजी वराह स्वरूप में अवतरित हुए। वराहदेव समुद्र में गए और अपने दांतों पर पृथ्वी रखकर बाहर ले आए। इसके बाद उन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया। हिरण्याक्ष नाम में हिरण्य का अर्थ स्वर्ण और अक्ष का अर्थ है आंखें। जिसकी आंखें दूसरे के धन पर लगी रहती हैं, वही हिरण्याक्ष होता है।

4. नृसिंह अवतार

नृसिंह अवतार प्राचीन समय में वैशाख माह में शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि हुआ था। इस अवतार के संबंध में भक्त प्रहलाद की कथा प्रचलित है। प्रहलाद को असुर हिरण्यकशिपु से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने एक खंबे से नृसिंह अवतार लिया था। इनका आधा शरीर शेर का और आधा शरीर इंसान का था। प्रहलाद हिरण्यकशिपु का पुत्र था, लेकिन वह विष्णुजी का परम भक्त था। इस कारण हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद को मारने के लिए कई बार प्रयास किए। लेकिन, हर बार विष्णुजी ने उसकी रक्षा की। भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध किया।

5. वामन अवतार

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर वामन प्रकोटत्सव मनाया जाता है। ये अवतार सतयुग में हुआ था। उस समय असुर राजा बलि ने देवताओं को पराजित करके स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया था। तब विष्णुजी ने देवमाता अदिति के गर्भ से वामन रूप में अवतार लिया। इसके बाद एक दिन राजा बलि यज्ञ कर रहा था, तब वामनदेव राजा बलि के पास गए और तीन पग धरती दान में मांगी। शुक्राचार्य के मना करने के बाद भी राजा बलि ने वामनदेव को तीन पग धरती दान में देने का वचन दे दिया। वामन ने विशाल रूप धारण किया और एक पग में धरती, दूसरे पग में स्वर्गलोक नाप लिया। तीसरा पैर रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने वामन को खुद सिर पर पग रखने को कहा। वामन भगवान ने जैसे ही बलि के सिर पर पैर रखा, वह पाताल लोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे पाताललोक का स्वामी बना दिया और सभी देवताओं को उनका स्वर्ग फिर से मिल गया।

6. परशुराम अवतार

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर भगवान विष्णु के अवतार परशुराम का जन्म हुआ था। परशुराम चिरंजीवी माने गए हैं। परशुराम ने हैहयवंशी क्षत्रियों के आतंक खत्म किया, राजा सहस्त्रार्जुन का वध किया था। परशुराम का जिक्र त्रेतायुग की रामायण और द्वापरयुग की महाभारत में भी है।

7. श्रीराम अवतार

चैत्र माह के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि पर श्रीराम प्रकटोत्सव मनाया जाता है। त्रेता युग में राजा दशरथ के यहां भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में जन्म लिया था। श्रीराम ने रावण के साथ ही उस समय के सभी अधर्मी असुरों का वध किया। धर्म और मर्यादा की स्थापना की थी। इसीलिए इन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी कहा जाता है।

8. श्रीकृष्ण अवतार

द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। उस समय श्रीकृष्ण ने कंस और उसके सभी साथी असुरों का वध किया। दुर्योधन के साथ ही पूरे कौरव वंश के आतंक को खत्म करने में पांडवों का मार्गदर्शन किया।

9. बुद्ध अवतार

भगवान बुद्ध को विष्णुजी का नवां अवतार माना गया है। गौतम बुद्ध का जन्म 2564 साल पहले लुंबिनी में हुआ था। लुंबिनी नेपाल में स्थित है। हर साल वैशाख मास की पूर्णिमा बुद्ध जयंती मनाई जाती है। बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की थी। उन्होंने समाज को अहिंसा और करुणा का संदेश दिया था।

10. कल्कि अवतार

भगवान विष्णु का दसवां अवतार कल्कि अभी प्रकट नहीं हुआ है। मान्यता है कि कलियुग करीब 4 लाख 32 हजार साल का है। अभी कलियुग के करीब 5 हजार साल ही हुए हैं। कलियुग के अंत में जब धरती पर अधर्म बहुत बढ़ जाएगा। धर्म लगभग खत्म होने लगेगा, उस समय धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु कल्कि के रूप में अवतार लेंगे। सभी अधर्मियों को खत्म करेंगे और फिर से धर्म की स्थापना करेंगे।



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