अग्नि पुराण कहता है इस पर्व पर पितरों के लिए किए गए श्राद्ध से मिलता है अक्षय पुण्य

सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध के साथ पितरों को विदाई देने की परंपरा है। काशी के ज्योतिषाचार्य और धर्मग्रंथों के जानकार पं. गणेश मिश्र का कहना है कि पुराणों और ज्योतिष ग्रंथ में इस दिन को बहुत खास बताया गया है। पद्म पुराण के मुताबिक वायु रुप में पृथ्वी पर आए पितर इस दिन वापस पितृ लोक चले जाते हैं। वहीं, अग्नि पुराण कहता है कि सर्वपितृ अमावस्या पर पितरों के लिए किए गए श्राद्ध से अक्षय पुण्य मिलता है। इस दिन किया गया तर्पण और पिंडदान पितरों को पूरे साल के लिए संतुष्ट करता है। इसके अलावा भास्कराचार्य ने ज्योतिष के सिद्धान्त शिरोमणि ग्रंथ में बताया है कि अश्विन महीने की अमावस्या पर पितरों का आधा दिन होता है। इस तिथि पर पितर संतुष्ट होकर अपने लोक चले जाते हैं।

  • पं. मिश्र बताते हैं कि 17 सितंबर यानी आज सूर्य राशि बदलकर कन्या में आएगा और ये दिन पितृ पक्ष का आखिरी दिन भी है। इस पर्व पर कन्या राशि में सूर्य के होने से पितरों के श्राद्ध का विशेष फल मिलेगा। इससे पहले ऐसा संयोग 17 सितंबर 1982 को बना था। अब 17 सितंबर 2039 को ऐसा होगा जब पितृ अमावस्या पर सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों ही उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में रहेंगे। ये ग्रह स्थिति इस पर्व को और भी शुभ बना रही है।

इस तिथि पर होता है सभी पितरों का श्राद्ध
पितृ पक्ष में पूर्वजों की मृत्यु तिथि वाले दिन श्राद्ध किए जाते हैं। इनके अलावा विशेष श्राद्ध के लिए अलग-अलग तिथियां बताई गई हैं। लेकिन लेकिन सर्वपितृ अमावस्या पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। इस तिथि पर किए गए श्राद्ध से पितर पूरी तरह संतुष्ट होते हैं। पं. मिश्रा का कहना है कि अश्विन महीने की अमावस्या को पितृ पर्व भी कहा जाता है। इस दिन श्राद्ध के बाद सभी पितर संतुष्ट होकर अपने लोक को चल

अमावस्या और पितरों का संबंध
सूर्य की हजारों किरणों में जो सबसे खास है उसका नाम अमा है। उस अमा नाम की किरण के तेज से ही सूर्य धरती को रोशन करता है। जब उस अमा किरण में चंद्रमा वास करना है यानी चंद्रमा के होने से अमवास्या हुई। तब उस किरण के जरिये चंद्रमा के उपरी हिस्से से पितर धरती पर आते हैं। इसीलिए श्राद्धपक्ष की अमावस्या तिथि का महत्व है।

तिलांजलि के साथ विदा होंगे पितर
पद्म, मार्कंडेय और अन्य पुराणों में कहा गया है कि अश्विन महीने की अमावस्या पर पितृ पिण्डदान और तिलांजलि चाहते हैं। उन्हें यह नहीं मिलता तो वे अतृप्त होकर ही चले जाते हैं। इससे पितृदोष लगता है। पं. मिश्र बताते हैं कि मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करने के बाद भी अमावस्या पर जाने-अनजाने में छुटे हुए सभी पीढ़ियों के पितरों को श्राद्ध के साथ विदा किया जाना चाहिए। इसी को महालय श्राद्ध कहा जाता है। इसलिए इसे पितरों की पूजा का उत्सव यानी पितृ पर्व कहा जाता है।



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
Agni Purana says Akshaya Punya is found on this festival by shraddha performed for fathers


Comments